बाल साहित्य की प्रासंगिकता पर व्याख्यान दतिया म.प्र.

बाल साहित्य की प्रासंगिकता पर व्याख्यान दतिया म.प्र.
 दतिया म.प्र.। स्थानीय स्वषासी शासकीय महाविद्यालय के हिन्दी विभाग द्वारा आयोजित समकालीन संदर्भ में बाल साहित्य की प्रासंगिकता पर संपूर्ण देष के विभिन्न अंचलों से पधारे हुए बाल साहित्यकारों एवं समीक्षकों ने सहभागिता की। सेवासदन महाविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष डाॅ. सुरेन्द्रकुमार जैन भारती ने संगोष्ठी में कहा कि हिन्दी बाल साहित्य का उत्स हमें लोरी गीतों में देखना चाहिए। आज से लगभग 2000 वर्ष पहले आचार्य कुन्दकुन्द की मां उन्हें बचपन में आध्यात्मिक लोरियां सुनाती थीं जिसमें बताया जाता था कि तुम शुध्द हो, बुध्द हो, निरंजन हो। भारतेन्दु हरिष्चन्द्र ने बालबोधिनी कृति लिखकर बाल साहित्य को प्रोत्साहित किया। समकालीन रचनाकारों में डाॅ. परषुराम शुक्ल ने बाल सतसई के नाम से 700 दोहे लिखे। डाॅ. जयजयराम आनंद ने बाल गीतों के अनेक संग्रह प्रकाषित करवाये। उनके बाल गीतों में प्राचीनता और नवीनता का बोध मनोरंजन, संस्कार, खेल-खेल में षिक्षा, विज्ञान-मनोविज्ञान सबकुछ है। आज हम बिना प्रयोजन के बच्चों को मोबाइल आदि पकड़ाकर उन्हें साहित्य एवं संस्कार से दूर कर रहे हैं। अच्छे गीत, अच्छे विचार, अच्छी कहानियां यदि बच्चों को पढ़ने और सुनने को मिलें तो बचपन बच भी सकता और संवर भी सकता है। संगोष्ठी का संचालन संयोजक डाॅ. नलिन गोस्वामी ने किया।